Tuesday, March 10, 2020

खिचडी

बडबोलापन बडा सुहाना
बको मुफ्त है बयानबाजी

किमत करतबगारोंकी है
मुफ्तखोर दिल्ली मे राजी.

आजादी की जंग लडोगे?
नकाबपोशों मुह दिखलाओ

हो तुम कोई, किसी भीडके
बहुत हुआ, अब तो बाज आओ.

जंग लगी मनमस्तिष्कोमे,
पारस घिसके हासिल क्या है ?

आंख मूंदकर निकले, उनका
कैसा रास्ता  मंझील क्या है ?

हरा गेरुंआ सफेद पहनो
पहनो काला सच ढकनेको

बिरबल तेरी गजब रसोई
खिचडी रखदी है पकनेको

क्या मै बोलू? दोस्त समझकर
कान तुम्हारे फूँक दिये है.

खुद अपनी ना सुन पाते हो
होंठ रुह के सूख गये है.

बिर्यानी हो या हो खिचडी
लगता है तुमको है भाती

इसिलीये इन बडबोलोंकी
यही बात तुमको रास आती....

"देखो भाई रामचरन तुम
तुमभी थोडा मियाँ देखलो

झगडालुपन कभी न छोडो
भूख लगी?ये खिचडी चखलो!"


                          . 🍃 संतोष

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