तहरीऱ
अब ये दिदार भी ,
तहरीऱ का, ना भाएँ मुझे!
अब क्यूँ है, गैर से
यूँ, लफ़्ज़ भी, ना चाहे मुझे?
अश्क भी सूख गये,
जिनसे मिले ,कुछ तारिक़!
अब तो बेखौफ़ है ,
ये राहें जो, ले जाये मुझे!
बात ईतनी न थी,
संगीन की तुम इतराओ!
मान भी जाओ,
की अब,तल्खीयाँ सतायें मुझे!
हुए गमगीन भी,
साये हमारे,तब थे हमराही!
आज तो,आब-ओ-हवा,
खुशनुमा! दो साथ मुझे!
वादा ये कर न सकू,
साथ जियूँ, मै हर पल!
पर कुबुल़,तुझसे मिली,
खुदकी यूँ,पहचान मुझे!
.🍃संतोष
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