Monday, March 15, 2021

तहरीऱ

तहरीऱ


अब ये दिदार भी ,

तहरीऱ का, ना भाएँ मुझे!


अब क्यूँ है, गैर से

यूँ, लफ़्ज़ भी, ना चाहे मुझे?


अश्क भी सूख गये,

जिनसे मिले ,कुछ तारिक़!


अब तो बेखौफ़ है ,

ये राहें जो, ले जाये मुझे!


बात ईतनी न थी,

संगीन की तुम इतराओ!


मान भी जाओ,

की अब,तल्खीयाँ सतायें मुझे!


हुए गमगीन भी,

साये हमारे,तब थे हमराही!

 

आज तो,आब-ओ-हवा,

खुशनुमा! दो साथ मुझे!


वादा ये कर न सकू,

साथ जियूँ, मै हर पल!


पर कुबुल़,तुझसे मिली,

खुदकी यूँ,पहचान मुझे!


                                   .🍃संतोष

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