यूं बादल की गोदमे,
छिप रहा चाँद हैं,
या मेरा मन!
खयालोंके दिये हैं
बुझ रहे,हैं शाम,
या हैं, मेरा मन?
रात के बाल बिखरें,
चांदनी हैं फुल सीं
फिर क्यूँ शिकन?
होंठ क्यूँ सिल गये,
खामोश चिलमन के,
ये हैं फिर, मेरा मन?
तप रही धूप से,
ना हैं गिला,
ना ये चुभन!
हैं याद, झुलसीं ख्वाहिशें!
उसमे थी, क्या वो
मेरा मन?
उम्रकैदी को,
झरोखा दिखायें
साज़़-ए-चमन,
उस नजारो,को ही
सच,मान चला
भोला ये मन!
रुबरु दर्द से यूं,
आबरु बेपर्दा हो जाये,
तो भी मंजूर हमे!
मय के प्याले ,पडे खाली,
या हैं फिर, मेरा मन!
नन्हीं चिडियाँ या
भरी चुडीयाँ, ढुंडे घर ही!
उम्र की चांदनी हो,
सिरपे उन्हे, ना हो घुटन!
सादगी साफ दिखे,
और जुबां, हो ये नयन!
ह़़या उनकी हैं या अब,
आ़ईने-रब,मै मेरा मन!
.🍃संतोष
No comments:
Post a Comment