उडतें परिंदे जो घूमे गगनमे,
क्या जान पायेंगे पिंजडे का गम!
दो वक्त़ रोटी!बेटा या बेटी!
दाढी या चोटी,में अटके है हम।...
अटके है लेकिन भटके नहीं है,
रिश्ते पुराने वो झटके नहीं है।
पक्के है हम कच्चे मटके नहीं है।
है खा़मियाँ !मुँह तो लटके नही है!
कुछ तो है हम मे भी दम !
उडतें परिंदे जो घुमे गगन में,
क्या जान पायेंगे कैसे है हम?....
परदे बहुत है,शर्ते बहुत है,
लेकिन मुहब्ब़त भी करते बहुत है!
बोली अलग है,डोली अलग है,
हर ईक काफिलेकी टोली अलग है।
लेकिन ये खु़षबु फि़जां मे जो फैली,
ये मिट्टी है सबकी,सबका फ़लक है।
सुलगी सी आशा ,सर्जन की भाषा,
कल का संदेशा, है पुख्त़ा अंदेशा।
माला विजय की ,है राह तकती
काटोंसे लडकरभी जितेंगे हम।
उडतें परिंदे जो घुमे गगन में,
वैसे ही मिलकरके घुमेंगे हम!..
.🍃संतोष
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