Wednesday, September 22, 2021

कल(१)

जख्म़ सिने मे दफन,

करके जिये उनकी फ़तेह।


जख्म़ सिनेसे लगाये हुएँ

क्यू्ँ बैठे हो?


अश्क जो पी गये वो,

पा सके मंझील अपनी।


अश्क सस्ते नहीं,

क्यूँ यूँ ही बहा बैठे हो!


बात तनहाईं से करते हूएँ,

वो मौज मे है।


अकेलेपन से क्यूँ तुम 

रुठे हुएँ बैठे हो?


अरे भोले मेरे मन 

तुझसे ही मै बात करू,


है जो पल उसमे रहो,

कल मे क्यूँ बैठे हो?

No comments:

Post a Comment

 नमन मम तव प्रति,...गणपती! गजानन, हे हेरंब..।ध्रु। झुणझुणझुण नुपुरनाद। थिरकतद्वय चपलपाद। घुणघुणघुण प्रणवनाद। भक्ती सुरस तव प्रसाद। मूलाधार, ...