जख्म़ सिने मे दफन,
करके जिये उनकी फ़तेह।
जख्म़ सिनेसे लगाये हुएँ
क्यू्ँ बैठे हो?
अश्क जो पी गये वो,
पा सके मंझील अपनी।
अश्क सस्ते नहीं,
क्यूँ यूँ ही बहा बैठे हो!
बात तनहाईं से करते हूएँ,
वो मौज मे है।
अकेलेपन से क्यूँ तुम
रुठे हुएँ बैठे हो?
अरे भोले मेरे मन
तुझसे ही मै बात करू,
है जो पल उसमे रहो,
कल मे क्यूँ बैठे हो?
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