अल्फा़ज महके!दिल को तसल्ली
वरना तो बागोंमे सूखे पडे है!
कागज के फूलोंका फैला गुलिस्तां
पेडोंपे छत्तेभी रुखे पडे है.
क्या ये शिकायत?हिमाक़त हमारी!
फहरे तरक्की का नायाब परचम!
लेकिन वो चिडीयाँ,वो जंगल की राहें?
आमोंके पत्तोंमे ,कोयल का पंचम?
सुनसान सारे,बंजर से परबत
कुछ घास,पौधे !वो भी झुलसते!
नुकीले वो लोहे के नाखून जिनके
करे खोख़ला,हाथ तनमें है धँसते
कुद़रत ने फुरसत से जो है तराशे
बने ढेर मिट्टी के,पत्थर उधसते.
उसपें भी कमजोर छत के सहारे
इकट्ठे कही पर है मजदूर बसते.
क्या ये उदासी? या मातम के नग़मे,
गिला समझिये या सलाह समझिये!
लेकिन कु़सुरवार अगले सदी के,
हम सब है का़तिल,जरुर समझिये!
नहीं आयेंगे जो हुएँ खत्म गुलशन,
नहीं आयेंगे वो गुलीस्ते-चमन!
लेकिन बचा है उसे तो सम्हांले,
गवाह खुदका खुदको है
अपना ही मन!
.🍃संतोष
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