बरगद दादा
बरगद दादा गांव के बुढे
खफा हैं,कहते,यूं मुंह मोडे,
'नहीं खेलने कोई आता
पंछी भी रुख मोडे जाता.'
बेबस और बेचैन बडे है
इसी बात पें यूंही अडे है.
उमर है कितनी,कौन बताये
किसे बिठाके साल गिनाये?
लंबी मुंछे हवा पें डोले
कहते,खेलो इनपे झुले!
धूप लगे तो छांव दिलाते
हवा के झोंके लोरी गाते...
चिंटी,तितली,किडेमकौडे
सबका घर हैं बरगद दादा
ढिलेढाले तेवर है और
जीवन इनका सिधा साधा.
नभ की निली चादर ओढे
बतियाते हैं तेज पवन सें
कभी पुरानी यादे लेकर
करे गुफ्तगु अपने मनसे.
ऐसे मेरे बरगद दादा,
जरा हटिले,लेकिन प्यारे!
झुरियां जैसे, पहने गहने,
जड से जुडे है सिर पें सितारे !
.🍃संतोष
No comments:
Post a Comment