नभ पिघलासा, घन पगलासा,
सावन मे खेले ये होली!
ये रस बरसा, जो था तरसा ,
वो तृप्त हुआ, मन का माली.
नवकुसुमित फुलोंकी गालोंको
चुमे नन्हीं बुंदनिया,
वो महक उठी, सौंधी खुशबु
माटीपर छनकी पैजनियां?
ये कविता की, पुस्तक से निकले,
शब्द दूरसे तकते है,
अब तो ,सावन के, कुछ टुकडें
खिडकी के बाहर दिखते है!
वो मोर पपिहें, यादोंकी
बादल मे खोये गुम से हुएं,
और छत पे बजते थे ताशें,
बूंदोंके, वो भी थम से गएं.
ये समय समय की बात है
लेकीन,अब भी सावन गाता है!
मीठा मल्हार भले न सही,
ईक धुनकी मस्त लगाता है
वो सूर उसका है ज्यों के त्यों!
जो मिल जाये तो क्या कहना!
महसूस करें भीगे पल को,
हर बात जरुरी है कहना?
.🍃संतोष
सावन मे खेले ये होली!
ये रस बरसा, जो था तरसा ,
वो तृप्त हुआ, मन का माली.
नवकुसुमित फुलोंकी गालोंको
चुमे नन्हीं बुंदनिया,
वो महक उठी, सौंधी खुशबु
माटीपर छनकी पैजनियां?
ये कविता की, पुस्तक से निकले,
शब्द दूरसे तकते है,
अब तो ,सावन के, कुछ टुकडें
खिडकी के बाहर दिखते है!
वो मोर पपिहें, यादोंकी
बादल मे खोये गुम से हुएं,
और छत पे बजते थे ताशें,
बूंदोंके, वो भी थम से गएं.
ये समय समय की बात है
लेकीन,अब भी सावन गाता है!
मीठा मल्हार भले न सही,
ईक धुनकी मस्त लगाता है
वो सूर उसका है ज्यों के त्यों!
जो मिल जाये तो क्या कहना!
महसूस करें भीगे पल को,
हर बात जरुरी है कहना?
.🍃संतोष
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