Monday, May 19, 2025

 *वही बारिश नयी बाते..*


अंदर तक खिडकी के भितर

बारिश की कुछ बुंदे आयी..

पहले बरसातों में भिगी यादे

मनमें फिर मुसकायी.


बंद करो खिडकी दरवाजे 

कुछ आवाजे दोहरायी पर..

रोक सकी ना उन बुंदोंकी

छनक चौखंटोनेभी सुनायी


बारिश लायी कुछ भीगापन 

नई उमंगे कुछ ताजापन.

बंजर धरती पे हरियाली

सख्त निगाहोमे अपनापन.


गर्म चाय की प्याली लेकर 

कुछ बातें बुंदोसे करना

बारिश तो आती जाती हैं

तुम कब महकोगे फिर वरना..


भिगा आंचल सहमी सांसे 

वर्तमान मे ना आयेगी.

बंद घरोंमे बरसातोंकी

खुशबू अब ना फिर छायेगी.


जितनी जैसी मिले वो बारिश

पी ले नो दो ओर पिलाओ

सतरंगी कुछ सपनोसे फिर

खुलके अपनी नजर मिलाओ.


                           .🍃 संतोष

No comments:

Post a Comment

 नमन मम तव प्रति,...गणपती! गजानन, हे हेरंब..।ध्रु। झुणझुणझुण नुपुरनाद। थिरकतद्वय चपलपाद। घुणघुणघुण प्रणवनाद। भक्ती सुरस तव प्रसाद। मूलाधार, ...