*वही बारिश नयी बाते..*
अंदर तक खिडकी के भितर
बारिश की कुछ बुंदे आयी..
पहले बरसातों में भिगी यादे
मनमें फिर मुसकायी.
बंद करो खिडकी दरवाजे
कुछ आवाजे दोहरायी पर..
रोक सकी ना उन बुंदोंकी
छनक चौखंटोनेभी सुनायी
बारिश लायी कुछ भीगापन
नई उमंगे कुछ ताजापन.
बंजर धरती पे हरियाली
सख्त निगाहोमे अपनापन.
गर्म चाय की प्याली लेकर
कुछ बातें बुंदोसे करना
बारिश तो आती जाती हैं
तुम कब महकोगे फिर वरना..
भिगा आंचल सहमी सांसे
वर्तमान मे ना आयेगी.
बंद घरोंमे बरसातोंकी
खुशबू अब ना फिर छायेगी.
जितनी जैसी मिले वो बारिश
पी ले नो दो ओर पिलाओ
सतरंगी कुछ सपनोसे फिर
खुलके अपनी नजर मिलाओ.
.🍃 संतोष
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