Monday, May 19, 2025

बरखा

 मूळ रचना - पं.कुमार गंधर्व


ऐसन कैसन बरसत बरखा


घिरी घिरी आइ छाय दिस चहुँवा


अंतरा


बहु दिन ते छिप गयो सूरजवा


ऊब रे गइ बरसन ते मनवा


स्वैर अनुवाद -

अश्या कश्या बरसत या धारा

घेरून दाही दिशा बघ साऱ्या...


बहु दिन तो रवि दडुनि बसला 

उबला जीव रे! संततधारा!!

                          .🍃 संतोष

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