मूळ रचना - पं.कुमार गंधर्व
ऐसन कैसन बरसत बरखा
घिरी घिरी आइ छाय दिस चहुँवा
अंतरा
बहु दिन ते छिप गयो सूरजवा
ऊब रे गइ बरसन ते मनवा
स्वैर अनुवाद -
अश्या कश्या बरसत या धारा
घेरून दाही दिशा बघ साऱ्या...
बहु दिन तो रवि दडुनि बसला
उबला जीव रे! संततधारा!!
.🍃 संतोष
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