Thursday, August 19, 2021

मुकाम


शुद्ध सत्य का,इस दुनिया मे 

बहुत कठिन है मिलना!

बिना मिलावट सोने का भी 

बना न सकते गहना!


वास्तव है ये,झूठ नहीं,

आकार हमे है भाता,

रागस्वरोंको समझाने मे,

शब्द काम मे आता.


निर्गुण उर्जा चलन वलन मे 

परिवर्तित हो जाती,

उसी समय सबको दिखती है 

वरना छुप सी जाती.


रुपक की जब चादर ओढे,

तत्त्व सामने आता,

वही पुराणोंकी काव्योंमे 

कवी चांव से गाता.


राम झूठ है? क्रुष्ण झूँठ है? 

झूँठ है फिर सब दुनिया!

निराकार को बिना जानके,

बेंचे वो तो बनिया!


सभी सिद्धताओंसे परे है,

उनका अब क्या कहना?

मूढमती,जो प्रमाण माँगे, 

भूल चूका है बहना.


अंतर्हेतू क्या है इस पर 

सब कुछ निर्भर भाई!

शुद्ध वस्तू का अंश सगुण मे

बात यही दोहराईं.


मूर्त भाव आकार लिये

जब करवाये कुछ लीला!

प्रेमकी गंगा उठे उमडकर 

भावभक्ती का मेला!


यही सगुण है ,प्रथम परिक्षा

तत्व बाद मे आता!

तत् त्वम् आदि,महावाक्य तब 

गुरुमुख से कहलाता!


तब तक थोडी करे तितिक्षा

श्रद्धा ना झूँठलाना.

मार्ग भिन्न है,लेकिन हम को

एक मुकाम है पाना।


                                   .🍃संतोष

No comments:

Post a Comment

 नमन मम तव प्रति,...गणपती! गजानन, हे हेरंब..।ध्रु। झुणझुणझुण नुपुरनाद। थिरकतद्वय चपलपाद। घुणघुणघुण प्रणवनाद। भक्ती सुरस तव प्रसाद। मूलाधार, ...