फिरसे बारिश,सावन फिरसे !
फिरसे घटासे,मोती बरसे!
वही पुरानी,और पहचानी,
इत्र हवा मे घुली किधरसे!
नया है क्या फिर?
सब तो वही है!
कहे जो कोई,यूँ तो सही है!..
शिशिरगलित सब पर्ण पुष्प ज्यों,
नवोत्साह से पुनः मुकुलित हो,
सुप्तभाव मे निद्रा लेते,
तृण के बीज पुनःआकुलित हो!
राग,ताल भी वही पुरातन,
उपज मिले तो नवसर्जित हो,
कणस्वर नूतन,नयी गुँजाईश
विसंवाद सब परिवर्जित हो!..
जैसे सारी बेलरिया भी
नये ऋतू मे फिर ऋतुमती हो,
जैसे भव की जननामृती मे
उसी चिरंतन की नित स्मृती हो!
ऋतूचक्रोंकी पुनरावृती मे
किसी काव्यकी यूँ अनुभुती हो...
ऐसे अनुभव देती बारिश,
गौर से देखे,सबको गुजारिश!
गिरता पानी सिर्फ नही है,
नया नजरियाँ,नयी है बारिश!
.🍃संतोष
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