Thursday, June 4, 2020

ख्वाईश

गुमसुमसी मनके किनारे खडी थी.
सूकूं के लम्होंकी वो ख्वाईश अकेली!

उसे अब अचानकसे मिलनेको आयी
सपनोंकी कश्ती मे ,नीली सहेली!

था फैला अंधेरा,कोहरा घना था
बहाने बहुत हमने उसमे पिरोये.

अभी ये घडी आ गयी जब मिलनकी
छाने लगे, बेरुखीके वो सांये!

वहां दूर, मजबूर, मजदूर पैदल.
कल का उठाये हुएं बोझ जाये.

छत है,गरम जेब, मुझको सताये
तनहा पलोंकी ये खाली घटांये.

जो है वो नहीं, जो नही उसको मांगे
अजब मनका बच्चा है कितना हटीला

पूरब चले कौम, पश्चिम को भागे
कभी साथ चलता, कभी ये अकेला.

नेता यूं बातोंमे उलझे हूए है,
कल का वो सूरज, है किसके हवाले?

बातोंकी कश्ती है, बातोंकी नदीयां
यहां तेज तैराक किसको बचाले?

बडा पेचिदा है सवालोंका ताला
न चाबी, न हल, ये तो मुश्किल समा है

चलो दिल को सहला सके उसको माने
सच तो है कडवा, जमाना थमा है!

हर इक आंसू पोंछे
हर इक गुल हो खिलता
मुन्कीन नहीं ये तो सपना सुहाना.

चलो अब टटोले जो है टोकरी मे
गया वो फसाना! है फिरसे कमाना.

                                . 🍃संतोष

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